विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्।
विद्वया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

भावार्थ :

विद्वान की लोक में प्रशंसा होती है, विद्वान को सर्वत्र गौरब मिलता है, विद्या से सब कुछ प्राप्त होता है और विद्या की सर्वत्र पूजा होती है ।

परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः।
ते एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत्॥

भावार्थ :

जो व्यक्ति परस्पर एक – दूसरे की बातों को अन्य लोगों को बता देते हैं वे बांबी के अन्दर के सांप के समान नष्ट हो जाते हैं ।

सर्वौषधीनामममृतं प्रधानं सर्वेषु सौख्येष्वशनं प्रधानम्।
सर्वेन्द्रियाणां नयनं प्रधानं सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम्॥

भावार्थ :

सभी औषधियों में अमृत (गिलोय) प्रधान है । सभी सुखों में भोजन प्रधान है । सभी इंद्रियों में आँखे मुख्य हैं । सभी अंगों में सर महत्वपूर्ण है ।

विद्यार्थी सेवकः पान्थः क्षुधार्तो भयकातरः।
भाण्डारी च प्रतिहारी सप्तसुप्तान् प्रबोधयेत॥

भावार्थ :

विद्यार्थी, सेवक, पथिक, भूख से दुःखी, भयभीत, भण्डारी, द्वारपाल – इन सातों को सोते हुए से जगा देना चाहिए ।

अहिं नृपं च शार्दूलं वराटं बालकं तथा।
परश्वानं च मूर्खं च सप्तसुप्तान् बोधयेत्॥

भावार्थ :

सांप, राजा, शेर, बर्र, बच्चा, दूसरे का कुत्ता तथा मूर्ख इनको सोए से नहीं जगाना चाहिए ।

दरिद्रता धीरयता विराजते कुवस्त्रता स्वच्छतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीलतया विराजते॥

भावार्थ :

धीरज से निर्धनता भी सुन्दर लगती है, साफ रहने पर मामूली वस्त्र भी अच्छे लगते हैं, गर्म किये जाने पर बासी भोजन भी सुन्दर जान परता है और शील – स्वभाव से कुरूपता भी सुन्दर लगती है ।

धनहीनो न च हीनश्च धनिक स सुनिश्चयः।
विद्या रत्नेन हीनो यः स हीनः सर्ववस्तुषु॥

भावार्थ :

धनहीन व्यक्ति हीन नहीं कहा जाता । उसे धनी ही समझना चाहिए । जो विद्यारत्न से है, वस्तुतः वह सभी वस्तुओं में हीन है ।

दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिवेत्।
शास्त्रपूतं वदेद् वाक्यं मनः पूतं समाचरेत्॥

भावार्थ :

आँख से अच्छी तरह देख कर पांव रखना चाहिए जल वस्त्र से छानकर पीना चाहिए । शाश्त्रों के अनुसार ही बात कहनी चाहिए तथा जिस काम को करने का मन आज्ञा दे, वही करना चाहिए ।

सुखार्थी चेत् त्यजेद्विद्यां त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी चेत् त्यजेत्सुखम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिनः सुखम्॥

भावार्थ :

यदि सुखों की इच्छा है, तो विद्या त्याग दो और यदि विद्या की इच्छा है, तो सुखों का त्याग कर दो । सुख चाहनेवाले को विद्या कहां तथा विद्या चाहनेवाले को सुख कहां ।

कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः।
मद्यपा किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः॥

भावार्थ :

कवि क्या नहीं देखते ? स्त्रियां क्या नहीं करतीं ? शराबी क्या नहीं बकते ? तथा कौए क्या नहीं खाते ?