Vidur Niti Slokas

अनिर्वेदः श्रियो मूलं लाभस्य च शुभस्य च। महान् भवत्यनिर्विण्णः सुखं चानन्त्यमश्नुते ॥

भावार्थ :
अपने काम में लगे रहनेवाला व्यक्ति सदा सुखी रहता है। धन-संपत्ति से उसका घर भरा -पूरा रहता है। ऐसा व्यक्ति यश -मान -सम्मान पाता है।

यत् सुखं सेवमानोपि धर्मार्थाभ्यां न हीयते। कामं तदुपसेवेत न मूढव्रतमाचरेत्। ॥

भावार्थ :
व्यक्ति को यह छूट है कि वह न्यायपूर्वक ओर धर्म के मार्ग पर चलकर इच्छानुसार सुखों का भरपूर उपभोग करें ,लेकिन उनमें इतना आसक़्त न हो जाए कि अधर्म का मार्ग पकड़ ले।

न चातिगुणवत्स्वेषा नान्यन्तं निर्गुणेषु च। नेषा गुणान् कामयते नैर्गुण्यात्रानुरज़्यते। उन्मत्ता गौरिवान्धा श्री क्वचिदेवावतिष्ठते॥

भावार्थ :
लक्ष्मी न तो प्रचंड ज्ञानियों के पास रहती है, न नितांत मूर्खो के पास। न तो इन्हें ज्ञानयों से लगाव है न मूर्खो से। जैसे बिगड़ैल गाय को कोई-कोई ही वश में कर पाता है, वैसे ही लक्ष्मी भी कहीं-कहीं ही ठहरती हैं ।

आलस्यं मदमोहौ चापलं गोष्टिरेव च। स्तब्धता चाभिमानित्वं तथा त्यागित्वमेव च। एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ॥

भावार्थ :
विद्यार्थियों को सात अवगुणों से दूर रहना चाहिए। ये हैं – आलस, नशा, चंचलता, गपशप, जल्दबाजी, अहंकार और लालच।

सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्। सुखार्थी वा त्यजेत् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्॥

भावार्थ :
सुख चाहने वाले से विद्या दूर रहती है और विद्या चाहने वाले से सुख। इसलिए जिसे सुख चाहिए, वह विद्या को छोड़ दे और जिसे विद्या चाहिए, वह सुख को।