किं स्तौमि त्वां गणाधीश योगशान्तिधरं परम् । वेदादयो ययुः शान्तिमतो देवं नमाम्यहम्॥

भावार्थ :
गणाधीश ! आप योगशान्तिधारी उत्कृष्ट देवता हैं, मैं आपको क्या स्तुति कर सकता हूँ ! आपकी स्तुति करने में तो वेद आदि भी शान्ति धारण कर लेते हैं अतः मैं आप गणेश देवता को नमस्कार करता हूँ ।

ब्रह्मभ्यो ब्रह्मदात्रे च गजानन नमोऽस्तु ते । आदिपूज्याय ज्येष्ठाय ज्येष्ठराजाय ते नमः ॥

भावार्थ :
आप ब्राह्मणों को ब्रह्म देते हैं, हे गजानन ! आपको नमस्कार है । आप प्रथम पूजनीय, ज्येष्ठ और ज्येष्ठराज हैं, आपको नमस्कार है ।

अनामयाय सर्वाय सर्वपूज्याय ते नमः । सगुणाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मणे निर्गुणाय च ॥

भावार्थ :
आप रोगरहित, सर्वस्वरूप और सबके पूजनीय हैं आपको नमस्कार है । आप ही सगुन और निर्गुण ब्रह्म हैं, आपको नमस्कार है ।

गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं कर्णचामरभूषितम् । पाशाङ्कुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥

भावार्थ :
हाथी के मुख वाले देवताओं में श्रेष्ठ, कर्णरूपी चामरों से विभूषित तथा पाश एवं अंकुश को धारण करनेवाले भगवान् गणनायक गणेश की मैं वन्दना करता हूँ ।

मौञ्जीकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतिनम् । बालेन्दुशकलं मौलौ वन्देऽहं गणनायकम् ॥

भावार्थ :
मुंजकी मेखला एवं कृष्णमृगचर्म को धारण करनेवाले तथा नाग का यज्ञोपवीत पहननेवाले और सिरपर बालचन्द्रकला को धारण करनेवाले गणनायक गणेश की मैं वन्दना करता हूँ ।

चित्ररत्नविचित्राङ्गं चित्रमालाविभूषितम् । कायरूपधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥

भावार्थ :
विचित्ररत्नों से चित्रित अंगोंवाले, विचित्र मालाओं से विभूषित तथा शरीररूप धारण करनेवाले उन भगवान् गणनायक गणेश की मैं वन्दना करता हूँ ।