नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।

अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।

विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ॥

भावार्थ :
हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत कोटि बार। हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार । हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे मुझको बड़ा किया; तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले एक बार। हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के सभी घटक, तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे कोटिशः नमस्कार । तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त कटिबद्ध हुए; वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ आशीर्वाद। सम्पूर्ण विश्व के लिये जिसे, जीतना न सम्भव हो पाये; ऐसी अजेय दे शक्ति कि जिससे, हम समर्थ हों सब प्रकार । दे ऐसा उत्तम शील कि जिसके, सम्मुख हो यह जग विनम्र; दे ज्ञान जो कि कर सके सुगम, स्वीकृत कन्टक पथ दुर्निवार। कल्याण और अभ्युदय का, एक ही उग्र साधन है जो; वह मेरे इस अन्तर में हो, स्फुरित वीरव्रत एक बार । जो कभी न होवे क्षीण निरन्तर, और तीव्रतर हो ऐसी; सम्पूर्ण ह्र्दय में जगे ध्येय, निष्ठा स्वराष्ट्र से बढे प्यार। निज राष्ट्र-धर्म रक्षार्थ निरन्तर, बढ़े संगठित कार्य-शक्ति; यह राष्ट्र परम वैभव पाये, ऐसा उपजे मन में विचार।