Chanakya Slokas (चाणक्य नीति श्लोक)

अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः। मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥

भावार्थ :
निर्धन व्यक्ति धन की कामना करते हैं और चौपाये अर्थात पशु बोलने की शक्ति चाहते हैं । मनुष्य स्वर्ग की इच्छा करता है और स्वर्ग में रहने वाले देवता मोक्ष-प्राप्ति की इच्छा करते हैं और इस प्रकार जो प्राप्त है सभी उससे आगे की कामना करते हैं ।

सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः। सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥

भावार्थ :
सत्य ही पृथ्वी को धारण करता है । सत्य से ही सूर्य तपता है । सत्य से ही वायु बहती है । सब कुछ सत्य में ही प्रतिष्ठित है ।

चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितमन्दिरे। चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः॥

भावार्थ :
लक्ष्मी चंचल है, प्राण, जीवन, शरीर सब कुछ चंचल और नाशवान है । संसार में केवल धर्म ही निश्चल है ।

श्रुत्वा धर्म विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्। श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥

भावार्थ :
सुनकर ही मनुष्य को अपने धर्म का ज्ञान होता है, सुनकर ही वह दुर्बुद्धि का त्याग करता है । सुनकर ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है और सुनकर ही मोक्ष मिलता है ।

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः। यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥

भावार्थ :
जिस व्यक्ति के पास पैसा है लोग स्वतः ही उसके मित्र बन जाते हैं । बन्धु- बान्धव भी उसे आ घेरते हैं । जो धनवान है उसी को आज के युग में विद्वान् और सम्मानित व्यक्ति मन जाता है

तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः। सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥

भावार्थ :
मनुष्य जैसा भाग्य लेकर आता है उसकी बुद्धि भी उसी समान बन जाती है, कार्य – व्यपार भी उसी अनुरूप मिलता है । उसके सहयोगी, संगी – साथी भी उसके भाग्य के अनुरूप ही होते हैं । सारा क्रियाकलाप भाग्यनुसार ही संचालित होता है ।

कालः पचति भूतानि कालः संहरते प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥

भावार्थ :
काल प्राणियों को निगल जाता है । काल सृष्टि का विनाश कर देता है । यह प्राणियों के सो जाने पर भी उनमें विद्यमान रहता है । इसका कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता ।

नैव पश्यति जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति। मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति॥

भावार्थ :
जन्मान्ध कुछ नहीं देख सकता । ऐसे ही कामान्ध और नशे में पागल बना व्यक्ति भी कुछ नहीं देखता । स्वार्थी व्यक्ति भी किसी में कोई दोष नहीं देखता ।

स्वयं कर्म कोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद्विमुच्यते॥

भावार्थ :
प्राणी स्वयं कर्म करता है और स्वयं उसका फल भोगता है । स्वयं संसार में भटकता है और स्वयं इससे मुक्त हो जाता है ।

राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः। भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्य पाप गुरुस्तथा॥

भावार्थ :
राष्ट द्वारा किये गए पाप को राजा भोगता है । राजा के पाप को उसका पुरोहित, पत्नी के पाप को पति तथा शिष्य के पाप को गुरु भोगता है ।