Sanskrit Essay On Pustkaly (पुस्तकालय संस्कृत निबंध)

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पुस्तकालयः

यत्र विविधानि पुस्तकानि पठनार्थं संगृहीतानि भवन्ति तत् स्थानम् पुस्तकालयः उच्यते । तत्र हि त्रिविधः पुस्तकालयः व्यक्तिगतः, विद्यालयीयः, सार्वजनिकश्च । व्यक्तिगतः पुस्तकालयः अध्यापकानां अन्येषां बुद्धिजीविनाम् च भवति । विद्यालयीयः विद्यालयस्य अंगम् भवति । छात्राणाम् अध्यापकानाम् च ज्ञानवर्द्धनाय विद्यालयीयः पुस्तकालयः भवति । अत्र शैक्षणिकानि पुस्तकानि संगृहीतानि भवन्ति । निर्धन-छात्राणां कृते विद्यालयीयः पुस्तकालयः अत्युपयोगी भवति । सार्वजनिकेषु पुस्तकालयेषु बहुविधानि पुस्तकानि भवन्ति । पुस्तकालयसम्पर्कात् शनैः -शनैः विद्यारुचिः जागर्ति । सम्प्रति गीतशीलः पुस्तकालयः अपि अस्ति ।

हिन्दी अनुवाद :
जहाँ अनेक प्रकार के पुस्तक पढ़ने के लिए संग्रह रहता है उस स्थान को पुस्तकालय कहा जाता है । पुस्तकालय तीन प्रकार के होते है – व्यक्तिगत, विद्यालयीय और सार्वजनिक । व्यक्तिगत पुस्तकालय अध्यापकों के लिए और बुद्धिजीवियों के लिए होता है । विद्यालीय विद्यालय का अंग होता है । छात्रों और अध्यापकों के ज्ञान के बुद्धि के लिए विद्यालीय पुस्तकालय होता है । यहाँ शिक्षण संबंधी पुस्तकें रहते हैं । गरीब छात्रों के लिए यह पुस्तकालय बहुत उपयोगी होता है । सार्वजनिक पुस्तकालय में विभिन्न प्रकार के पुस्तक रहते है । पुस्तकालय के सम्पर्क में रहने से धीरे-धीरे विद्या में रूचि बढ़ता है । आजकल गीतशील पुस्तकालय भी है ।

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