Vyayam Sanskrit Essay (व्यायाम संस्कृत निबंध)

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व्यायामः

भ्रमण-धावन-क्रीडनादिभिः शरीरम् श्रान्तकरणम् व्यायामः कथ्यते । व्यायामः नित्यं करणीयः भवति । अस्य नित्यानुष्ठानेन गात्राणि पुष्ठानि भवन्ति । शरीरे द्रुतं रक्तसञ्चारः भवति । प्रस्वेदैः शरीरात् आमयं विषं च निर्गच्छति । अनेन पावनकर्म अपि सम्यक् भवति । व्यवहितः व्यायामः यथैव अस्वास्थ्यप्रदः भवति तथैव अव्यवहित व्यायामः स्वास्थ्यकरः भवति । स्वस्थे शरीरे एव स्वस्थं मस्तिकं भवति । स्वस्थः जनः सुयोग्यः नागरिकः भवति । देशसेवां स्वस्थे एव नागरिकाः कुर्वन्ति । न चास्ति सदृशं तेन किंचित्स्थौल्यापकर्षणम् । आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते । शरीर- माद्यं खलु धर्मसाधनम्।

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।
आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥

हिन्दी अनुवाद :
घूमना, दौड़ना और विभिन्न प्रकार का खेल शरीर के लिए व्यायाम कहा जाता है । व्ययाम प्रतिदिन करना पड़ता है । इसके प्रतिदिन करने से शरीर स्वस्थ होता है । शरीर में तेजी से रक्त संचार होता है । शरीर पे पसीना आता है और पसीना निकलने से शरीर का विकार निकलता है । इससे पाचन किया भी ठीक होता है । व्यवहित व्यायाम जैसे अलाभकारी होता है वैसे ही अव्यवहित व्यायाम लाभकारी होता है । स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है । स्वस्थ लोग ही सुयोग्य नागरिक होता है । देशसेवा स्वस्थ नागरिक ही कर सकते हैं । अधिक स्थूलता को दूर करने के लिए व्यायाम से बढ़कर कोई और औषधि नहीं है । परम आरोग्य अर्थात् आदर्श स्वास्थ्य की प्राप्ति व्यायाम से ही होती है । शरीर की रक्षा करना भी एक धर्म है ।

व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है।
निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं ।

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